||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ११ ||
||ॐ श्री परमात्मने नमः ||
अध्याय अकरावा |
विश्वरूपदर्शनयोगः |
||ॐ श्री परमात्मने नमः ||
अध्याय अकरावा |
विश्वरूपदर्शनयोगः |
आतां यावरी एकादशीं| कथा आहे दोहीं रसीं| येथ पार्था विश्वरूपेंसीं| होईल भेटी ||१||
जेथ शांताचिया घरा| अद्भुत आला आहे पाहुणेरा| आणि येरांही रसां पांतिकरां| जाहला मानु ||२||
अहो वधुवरांचिये मिळणीं| जैशी वराडियां लुगडीं लेणीं| तैसे देशियेच्या सुखासनीं| मिरविले रस ||३||
परी शांताद्भुत बरवे| जे डोळियांच्या अंजुळीं घ्यावें| जैसे हरिहर प्रेमभावें| आले खेंवा ||४||
ना तरी अंवसेच्या दिवशीं| भेटलीं बिंबें दोनी जैशीं| तेवीं एकवळा रसीं| केला एथ ||५||
मीनले गंगेयमुनेचे ओघ| तैसें रसां जाहलें प्रयाग| म्हणौनि सुस्नात होत जग| आघवें एथ ||६||
माजीं गीता सरस्वती गुप्त| आणि दोनी रस ते ओघ मूर्त| यालागीं त्रिवेणी हे उचित| फावली बापा ||७||
एथ श्रवणाचेनि द्वारें| तीर्थीं रिघतां सोपारें| ज्ञानदेवो म्हणे दातारें| माझेनि केलें ||८||
तीरें संस्कृताचीं गहनें| तोडोनि मऱ्हाठियां शब्दसोपानें| रचिली धर्मनिधानें| श्रीनिवृत्तिदेवें ||९||
म्हणौनि भलतेणें एथ सद्भावें नाहावें| प्रयागमाधव विश्वरूप पहावें| येतुलेनि संसारासि द्यावें| तिळोदक ||१०||
हें असो ऐसें सावयव| एथ सासिन्नले आथी रसभाव| तेथ श्रवणसुखाची राणीव| जोडली जगा ||११||
जेथ शांताद्भुत रोकडे| आणि येरां रसां पडप जोडे| हें अल्पचि परी उघडें| कैवल्य एथ ||१२||
तो हा अकरावा अध्यायो| जो देवाचा आपणपें विसंवता ठावो| परी अर्जुन सदैवांचा रावो| जो एथही पातला ||१३||
एथ अर्जुनचि काय म्हणों पातला| आजि आवडतयाही सुकाळु जाहला| जे गीतार्थु हा आला| मऱ्हाठिये ||१४||
याचिलागीं माझें| विनविलें आइकिजे| तरी अवधान दीजे| सज्जनीं तुम्ही ||१५||
तेवींचि तुम्हां संतांचिये सभे| ऐसी सलगी कीर करूं न लभे| परी मानावें जी तुम्ही लोभें| अपत्या मज ||१६||
अहो पुंसा आपणचि पढविजे| मग पढे तरी माथा तुकिजे| कां करविलेनि चोजें न रिझे| बाळका माय ||१७||
तेवीं मी जें जें बोलें| तें प्रभु तुमचेंचि शिकविलें| म्हणौनि अवधारिजो आपुलें| आपण देवा ||१८||
हें सारस्वताचें गोड| तुम्हींचि लाविलें जी झाड| तरी आतां अवधानामृतें वाड| सिंपोनि कीजे ||१९||
मग हें रसभाव फुलीं फुलेल| नानार्थ फळभारें फळा येईल| तुमचेनि धर्में होईल| सुरवाडु जगा ||२०||
या बोला संत रिझले| म्हणती तोषलों गा भलें केलें| आतां सांगैं जें बोलिलें| अर्जुनें तेथ ||२१||
तंव निवृत्तिदास म्हणे| जी कृष्णार्जुनांचें बोलणें| मी प्राकृत काय सांगों जाणें| परी सांगवा तुम्ही ||२२||
अहो रानींचिया पालेखाइरा| नेवाणें करविले लंकेश्वरा| एकला अर्जुन परी अक्षौहिणी अकरा| न जिणेचि काई ? ||२३||
म्हणौनि समर्थ जें जें करी| तें न हो न ये चराचरीं| तुम्ही संत तयापरी| बोलवा मातें ||२४||
आतां बोलिजतसें आइका| हा गीताभाव निका| जो वैकुंठनायका- | मुखौनि निघाला ||२५||
बाप बाप ग्रंथ गीता| जो वेदीं प्रतिपाद्य देवता| तो श्रीकृष्ण वक्ता| जिये ग्रंथीं ||२६||
तेथिंचे गौरव कैसें वानावें| जें श्रीशंभूचिये मती नागवे| तें आतां नमस्कारिजे जीवेंभावें| हेंचि भलें ||२७||
मग आइका तो किरीटी| घालूनि विश्वरूपीं दिठी| पहिली कैसी गोठी| करिता जाहला ||२८||
हें सर्वही सर्वेश्वरु| ऐसा प्रतीतिगत जो पतिकरु| तो बाहेरी होआवा गोचरु| लोचनांसी ||२९||
हे जिवाआंतुली चाड| परी देवासि सांगतां सांकड| कां जें विश्वरूप गूढ| कैसेनि पुसावें ? ||३०||
म्हणे मागां कवणीं कहीं| जें पढियंतेनें पुसिलें नाहीं| ते सहसा कैसें काई| सांगा म्हणों ? ||३१||
मी जरी सलगीचा चांगु| तरी काय आइसीहूनी अंतरंगु| परी तेही हा प्रसंगु| बिहाली पुसों ||३२||
माझी आवडे तैसी सेवा जाहली| तरी काय होईल गरुडाचिया येतुली ? | परी तोही हें बोली| करीचिना ||३३||
मी काय सनकादिकांहूनि जवळां| परी तयांही नागवेचि हा चाळा| मी आवडेन काय प्रेमळां| गोकुळींचिया ऐसा ? ||३४||
तयांतेंही लेकुरपणें झकविलें| एकाचे गर्भवासही साहिले| परी विश्वरूप हें राहविलें| न दावीच कवणा ||३५||
हा ठायवरी गुज| याचिये अंतरीचें हें निज| केवीं उराउरी मज| पुसों ये पां ? ||३६||
आणि न पुसेंचि जरी म्हणे| तरी विश्वरूप देखिलियाविणें| सुख नोहेचि परी जिणें| तेंही विपायें ||३७||
म्हणौनि आतां पुसों अळुमाळसें| मग करूं देवा आवडे तैसें| येणें प्रवर्तला साध्वसें| पार्थु बोलों ||३८||
परी तेंचि ऐसेनि भावें| जें एका दों उत्तरांसवें| दावी विश्वरूप आघवें| झाडा देउनी ||३९||
अहो वांसरूं देखिलियाचिसाठीं| धेनु खडबडोनि मोहें उठी| मग स्तनामुखाचिये भेटी| काय पान्हा धरे ? ||४०||
पाहा पां तया पांडवाचेनि नांवें| जो कृष्ण रानींही प्रतिपाळूं धावे| तयांतें अर्जुनें जंव पुसावें| तंव साहील काई ? ||४१||
तो सहजेंचि स्नेहाचें अवतरण| आणि येरु स्नेहा घातलें आहे माजवण| ऐसिये मिळवणी वेगळेपण| उरे हेंचि बहु ||४२||
म्हणौनि अर्जुनाचिया बोलासरिसा| देव विश्वरूप होईल आपैसा| तोचि पहिला प्रसंगु ऐसा| ऐकिजे तरी ||४३||
अर्जुन उवाच |
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् |
यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ||१||
मग पार्थु देवातें म्हणे| जी तुम्ही मजकारणें| वाच्य केलें जें न बोलणें| कृपानिधे ||४४||
जैं महाभूतें ब्रह्मीं आटती| जीव महदादींचे ठाव फिटती| तैं जें देव होऊनि ठाकती| तें विसवणें शेषींचें ||४५||
होतें हृदयाचिये परिवरीं| रोंविलें कृपणाचिये परी| शब्दब्रह्मासही चोरी| जयाची केली ||४६||
तें तुम्हीं आजि आपुलें| मजपुढां हियें फोडिलें| जया अध्यात्मा वोवाळिलें| ऐश्वर्य हरें ||४७||
ते वस्तु मज स्वामी| एकिहेळां दिधली तुम्ही| हें बोलों तरी आम्ही| तुज पावोनि कैंचे ||४८||
परी साचचि महामोहाचिये पुरीं| बुडालेया देखोनि सीसवरी| तुवां आपणपें घालोनि श्रीहरी| मग काढिलें मातें ||४९||
एक तूंवांचूनि कांहीं| विश्वीं दुजियाची भाष नाहीं| कीं आमुचें कर्म पाहीं| जे आम्हीं आथी म्हणों ||५०||
मी जगीं एक अर्जुनु| ऐसा देहीं वाहे अभिमानु| आणि कौरवांतें इयां स्वजनु| आपुलें म्हणें ||५१||
याहीवरी यांतें मी मारीन| म्हणें तेणें पापें कें रिगेन| ऐसें देखत होतों दुःस्वप्न| तों चेवविला प्रभु ||५२||
देवा गंधर्वनगरीची वस्ती| सोडूनि निघालों लक्ष्मीपती| होतों उदकाचिया आर्ती| रोहिणी पीत ||५३||
जी किरडूं तरी कापडाचें| परी लहरी येत होतिया साचें| ऐसें वायां मरतया जीवाचें| श्रेय तुवां घेतलें ||५४||
आपुलें प्रतिबिंब नेणता| सिंह कुहां घालील देखोनि आतां| ऐसा धरिजे तेवीं अनंता| राखिलें मातें ||५५||
एऱ्हवीं माझा तरी येतुलेवरी| एथ निश्चय होता अवधारीं| जें आतांचि सातांही सागरीं| एकत्र मिळिजे ||५६||
हें जगचि आघवें बुडावें| वरी आकाशहि तुटोनि पडावें| परी झुंजणें न घडावें| गोत्रजेशीं मज ||५७||
ऐसिया अहंकाराचिये वाढी| मियां आग्रहजळीं दिधली होती बुडी| चांगचि तूं जवळां एऱ्हवीं काढी| कवणु मातें ||५८||
नाथिलें आपण पां एक मानिलें| आणि नव्हतया नाम गोत्र ठेविलें| थोर पिसें होतें लागलें| परि राखिलें तुम्ही ||५९||
मागां जळत काढिलें जोहरीं| तैं तें देहासीच भय अवधारीं| आतां हे जोहरवाहर दुसरी| चैतन्यासकट ||६०||
दुराग्रह हिरण्याक्षें| माझी बुद्धि वसुंधरा सूदली काखे| मग माहार्णव गवाक्षें| रिघोनि ठेला ||६१||
तेथ तुझेनि गोसावीपणें| एकवेळ बुद्धीचिया ठाया येणें| हें दुसरें वराह होणें| पडिलें तुज ||६२||
ऐसें अपार तुझें केलें| एकी वाचा काय मी बोलें| परी पांचही पालव मोकलिले| मजप्रती ||६३||
तें कांहीं न वचेचि वायां| भलें यश फावलें देवराया| जे साद्यंत माया| निरसिली माझी ||६४||
आजीं आनंदसरोवरींचीं कमळें| तैसे हे तुझे डोळे| आपुलिया प्रसादाचीं राउळें| जयालागीं करिती ||६५||
हां हो तयाही आणि मोहाची भेटी| हे कायसी पाबळी गोठी ? | केउती मृगजळाची वृष्टी| वडवानळेंसीं ? ||६६||
आणि मी तंव दातारा| ये कृपेचिये रिघोनि गाभारां| घेत आहें चारा| ब्रह्मरसाचा ||६७||
तेणें माझा जी मोह जाये| एथ विस्मो कांहीं आहे ? | तरी उद्धरलों कीं तुझे पाये| शिवतले आहाती ||६८||
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया |
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ||२||
पैं कमलायतडोळसा| सूर्यकोटितेजसा| मियां तुजपासोनि महेशा| परिसिलें आजीं ||६९||
इयें भूतें जयापरी होती| अथवा लया हन जैसेनि जाती| ते मजपुढां प्रकृती| विवंचिली देवें ||७०||
आणि प्रकृती कीर उगाणा दिधला| वरि पुरुषाचाही ठावो दाविला| जयाचा महिमा पांघरोनि जाहला| धडौता वेदु ||७१||
जी शब्दराशी वाढे जिये| कां धर्माऐशिया रत्नांतें विये| ते एथिंचे प्रभेचे पाये| वोळगे म्हणौनि ||७२||
ऐसें अगाध माहात्म्य| जें सकळमार्गैकगम्य| जें स्वात्मानुभवरम्य| तें इयापरी दाविलें ||७३||
जैसा केरु फिटलिया आभाळीं| दिठी रिगे सूर्यमंडळीं| कां हातें सारूनि बाबुळीं| जळ देखिजे ||७४||
नातरी उकलतया सापाचे वेढे| जैसें चंदना खेंव देणें घडे| अथवा विवसी पळे मग चढे| निधान हातां ||७५||
तैसी प्रकृती हे आड होती| ते देवेंचि सारोनि परौती| मग परतत्त्व माझिये मती| शेजार केलें ||७६||
म्हणौनि इयेविषयींचा मज देवा| भरंवसा कीर जाहला जीवा| परी आणीक एक हेवा| उपनला असे ||७७||
तो भिडां जरी म्हणों राहों| तरी आना कवणा पुसों जावों| काय तुजवांचोनि ठावो| जाणत आहों आम्ही ? ||७८||
जळचरु जळाचा आभारु धरी| बाळक स्तनपानीं उपरोधु करी| तरी तया जिणया श्रीहरी| आन उपायो असे ? ||७९||
म्हणौनि भीड सांकडी न धरवे| जीवा आवडे तेंही तुजपुढां बोलावें| तंव राहें म्हणितलें देवें| चाड सांगैं ||८०||
एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर |
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ||३||
मग बोलिला तो किरीटी| म्हणे तुम्हीं केली जे गोठी| तिया प्रतीतीची दिठी| निवाली माझी ||८१||
आतां जयाचेनि संकल्पें| हे लोकपरंपरा होय हारपे| जया ठायातें आपणपें| मी ऐसें म्हणसी ||८२||
तें मुद्दल रूप तुझें| जेथूनि इयें द्विभुजें हन चतुर्भुजें| सुरकार्याचेनि व्याजें| घेवों घेवों येसी ||८३||
पैं जळशयनाचिया अवगणिया| कां मत्स्य कूर्म इया मिरवणिया| खेळु सरलिया तूं गुणिया| सांठविसी जेथ ||८४||
उपनिषदें जें गाती| योगिये हृदयीं रिगोनि पाहाती| जयातें सनकादिक आहाती| पोटाळुनियां ||८५||
ऐसें अगाध जें तुझें| विश्वरूप कानीं ऐकिजे| तें देखावया चित्त माझें| उतावीळ देवा ||८६||
देवें फेडूनियां सांकड| लोभें पुसिली जरी चाड| तरी हेंचि एकीं वाड| आर्तीं जी मज ||८७||
तुझें विश्वरूपपण आघवें| माझिये दिठीसि गोचर होआवें| ऐसी थोर आस जीवें| बांधोनि आहें ||८८||
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो |
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम् ||४||
परी आणीक एक एथ शारङ्गी| तुज विश्वरूपातें देखावयालागीं| पैं योग्यता माझिया आंगीं| असे कीं नाहीं ||८९||
हें आपलें आपण मी नेणें| तें कां नेणसी जरी देव म्हणे| तरी सरोगु काय जाणे| निदान रोगाचें ? ||९०||
आणि जी आर्तीचेनि पडिभरें| आर्तु आपुली ठाकी पैं विसरे| जैसा तान्हेला म्हणे न पुरे| समुद्र मज ||९१||
ऐशा सचाडपणाचिये भुली| न सांभाळवे समस्या आपुली| यालागीं योग्यता जेवीं माउली| बालकाची जाणे ||९२||
तयापरी श्रीजनार्दना| विचारिजो माझी संभावना| मग विश्वरूपदर्शना| उपक्रम कीजे ||९३||
तरी ऐसी ते कृपा करा| एऱ्हवीं नव्हे हें म्हणा अवधारा| वायां पंचमालापें बधिरा| सुख केउतें देणें ? ||९४||
एऱ्हवीं येकले बापियाचे तृषे| मेघ जगापुरतें काय न वर्षे ? | परी जहालीही वृष्टि उपखे| जऱ्ही खडकीं होय ||९५||
चकोरा चंद्रामृत फावलें| येरा आण वाहूनि काय वारिलें ? | परी डोळ्यांवीण पाहलें| वायां जाय ||९६||
म्हणौनि विश्वरूप तूं सहसा| दाविसी कीर हा भरवंसा| कां जे कडाडां आणि गहिंसा- | माजी नीत्य नवा तूं कीं ||९७||
तुझें औदार्य जाणों स्वतंत्र| देतां न म्हणसी पात्रापात्र| पैं कैवल्या ऐसें पवित्र| जें वैरियांही दिधलें ||९८||
मोक्षु दुराराध्यु कीर होय| परी तोही आराधी तुझे पाय| म्हणौनि धाडिसी तेथ जाय| पाइकु जैसा ||९९||
तुवां सनकादिकांचेनि मानें| सायुज्यीं सौरसु दिधला पूतने| जे विषाचेनि स्तनपानें| मारूं आली ||१००||
हां गा राजसूय यागाचिया सभासदीं| देखतां त्रिभुवनाची मांदी| कैसा शतधा दुर्वाक्य शब्दीं| निस्तेजिलासी ||१०१||
ऐशिया अपराधिया शिशुपाळा| आपणपें ठावो दिधला गोपाळा| आणि उत्तानचरणाचिया बाळा |
काय ध्रुवपदीं चाड ? ||१०२||
तो वना आला याचिलागीं| जे बैसावें पितयाचिया उत्संगीं| कीं तो चंद्रसूर्यादिकांपरिस जगीं| श्लाघ्यु केला ||१०३||
ऐसा वनवासिया सकळां| देतां एकचि तूं धसाळा| पुत्रा आळवितां अजामिळा| आपणपें देसी ||१०४||
जेणें उरीं हाणितलासि पांपरा| तयाचा चरणु वाहासी दातारा| अझुनी वैरियांचिया कलेवरा| विसंबसीना ||१०५||
ऐसा अपकारियां तुझा उपकारु| तूं अपात्रींही परी उदारु| दान म्हणौनि दारवंठेकरु| जाहलासी बळीचा ||१०६||
तूंतें आराधी ना आयकें| होती पुंसा बोलावित कौतुकें| तिये वैकुंठीं तुवां गणिके| सुरवाडु केला ||१०७||
ऐसीं पाहूनि वायाणीं मिषें| आपणपें देवों लागसी वानिवसें| तो तूं कां अनारिसें| मजलागीं करिसी ||१०८||
हां गा दुभतयाचेनि पवाडें| जे जगाचें फेडी सांकडें| तिये कामधेनूचे पाडे| काय भुकेले ठाती ? ||१०९||
म्हणौनि मियां जें विनविलें कांहीं| तें देव न दाखविती हें कीर नाहीं| परी देखावयालागीं देईं| पात्रता मज ||११०||
तुझें विश्वरूप आकळे| ऐसे जरी जाणसी माझे डोळे| तरी आर्तीचे डोहळे| पुरवीं देवा ||१११||
ऐसी ठायेंठावो विनंती| जंव करूं सरला सुभद्रापती| तंव तया षड्गुणचक्रवर्ती| साहवेचिना ||११२||
तो कृपापीयूषसजळु| आणि येरु जवळां आला वर्षाकाळु| नाना कृष्ण कोकिळु| अर्जुन वसंतु ||११३||
नातरी चंद्रबिंब वाटोळें| देखोनि क्षीरसागर उचंबळे| तैसा दुणेंही वरी प्रेमबळें| उल्लसितु जाहला ||११४||
मग तिये प्रसन्नतेचेनि आटोपें| गाजोनि म्हणितलें सकृपें| पार्था देख देख अमुपें| स्वरूपें माझीं ||११५||
एक विश्वरूप देखावें| ऐसा मनोरथु केला पांडवें| कीं विश्वरूपमय आघवें| करूनि घातलें ||११६||
बाप उदार देवो अपरिमितु| याचक स्वेच्छा सदोदितु| असे सहस्रवरी देतु| सर्वस्व आपुलें ||११७||
अहो शेषाचेहि डोळे चोरिले| वेद जयालागीं झकविले| लक्ष्मीयेही राहविलें| जिव्हार जें ||११८||
तें आतां प्रकटुनी अनेकधा| करीत विश्वरूपदर्शनाचा धांदा| बाप भाग्या अगाधा| पार्थाचिया ||११९||
जो जागता स्वप्नावस्थे जाये| तो जेवीं स्वप्नींचें आघवें होये| तेवीं अनंत ब्रह्मकटाह आहे| आपणचि जाहला ||१२०||
ते सहसा मुद्रा सोडिली| आणि स्थूळदृष्टीची जवनिका फेडिली| किंबहुना उघडिली| योगऋद्धी ||१२१||
परी हा हें देखेल कीं नाहीं| ऐसी सेचि न करी कांहीं| एकसरां म्हणतसे पाहीं| स्नेहातुर ||१२२||
श्रीभगवानुवाच |
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः |
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ||५||
अर्जुना तुवां एक दावा म्हणितलें| आणि तेंचि दावूं तरी काय दाविलें| आतां देखें आघवें भरिलें| माझ्याचि रूपीं ||१२३||
एकें कृशें एकें स्थूळें| एकें ऱ्हस्वें एकें विशाळें| पृथुतरें सरळें| अप्रांतें एकें ||१२४||
एकें अनावरें प्रांजळें| सव्यापारें एकें निश्चळें| उदासीनें स्नेहाळें| तीव्रें एकें ||१२५||
एके घूर्णितें सावधें| असलगें एकें अगाधें| एकें उदारें अतिबद्धें| क्रुद्धें एकें ||१२६||
एकें शांतें सन्मदें| स्तब्धें एकें सानंदें| गर्जितें निःशब्दें| सौम्यें एकें ||१२७||
एकें साभिलाषें विरक्तें| उन्निद्रितें एकें निद्रितें| परितुष्टें एकें आर्तें| प्रसन्नें एकें ||१२८||
एकें अशस्त्रें सशस्त्रें| एकें रौद्रें अतिमित्रें| भयानकें एकें पवित्रें| लयस्थें एकें ||१२९||
एकें जनलीलाविलासें| एकें पालनशीलें लालसें| एकें संहारकें सावेशें| साक्षिभूतें एकें ||१३०||
एवं नानाविधें परी बहुवसें| आणि दिव्यतेजप्रकाशें| तेवींचि एकएका ऐसें| वर्णेंही नव्हे ||१३१||
एकें तातलें साडेपंधरें| तैसीं कपिलवर्णें अपारें| एकें सर्वांगीं जैसें सेंदुरें| डवरलें नभ ||१३२||
एकें सावियाचि चुळुकीं| जैसें ब्रह्मकटाह खचिलें माणिकीं| एकें अरुणोदयासारिखीं| कुंकुमवर्णें ||१३३||
एकें शुद्धस्फटिकसोज्वळें| एकें इंद्रनीळसुनीळें| एकें अंजनवर्णें सकाळें| रक्तवर्णें एकें ||१३४||
एकें लसत्कांचनसम पिंवळीं| एकें नवजलदश्यामळीं| एकें चांपेगौरीं केवळीं| हरितें एकें ||१३५||
एकें तप्तताम्रतांबडीं| एकें श्वेतचंद्र चोखडीं| ऐसीं नानावर्णें रूपडीं| देखें माझीं ||१३६||
हे जैसे कां आनान वर्ण| तैसें आकृतींही अनारिसेपण| लाजा कंदर्प रिघाला शरण| तैसीं सुंदरें एकें ||१३७||
एकें अतिलावण्यसाकारें| एकें स्निग्धवपु मनोहरें| शृंगारश्रियेचीं भांडारें| उघडिली जैसीं ||१३८||
एकें पीनावयवमांसाळें| एकें शुष्कें अति विक्राळें| एकें दीर्घकंठें विताळें| विकटें एकें ||१३९||
एवं नानाविधाकृती| इयां पाहतां पारु नाहीं सुभद्रापती| ययांच्या एकेकीं अंगप्रांतीं| देख पां जग ||१४०||
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रान् अश्विनौ मरुतस्तथा |
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ||६||
जेथ उन्मीलन होत आहे दिठी| तेथ पसरती आदित्यांचिया सृष्टी| पुढती निमीलनीं मिठीं| देत आहाती ||१४१||
वदनींचिया वाफेसवें| होत ज्वाळामय आघवें| जेथ पावकादिक पावे| समूह वसूंचा ||१४२||
आणि भ्रूलतांचे शेवट| कोपें मिळों पाहतीं एकवट| तेथ रुद्रगणांचे संघाट| अवतरत देखें ||१४३||
पैं सौम्यतेचा बोलावा| मिती नेणिजे अश्विनौदेवां| श्रोत्रीं होती पांडवा| अनेक वायु ||१४४||
यापरी एकेकाचिये लीळे| जन्मती सुरसिद्धांचीं कुळें| ऐसीं अपारें आणि विशाळें| रूपें इयें पाहीं ||१४५||
जयांतें सांगावया वेद बोबडे| पहावया काळाचेंही आयुष्य थोकडें| धातयाही परी न सांपडे| ठाव जयांचा ||१४६||
जयांतें देवत्रयी कधीं नायके| तियें इयें प्रत्यक्ष देख अनेकें| भोगीं आश्चर्याची कवतिकें| महासिद्धी ||१४७||
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् |
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्दृष्टुमिच्छसि ||७||
इया मूर्तीचिया किरीटी| रोममूळीं देखें पां सृष्टी| सुरतरुतळवटीं| तृणांकुर जैसे ||१४८||
चंडवाताचेनि प्रकाशें| उडत परमाणु दिसती जैसे| भ्रमत ब्रह्मकटाह तैसें| अवयवसंधीं ||१४९||
एथ एकैकाचिया प्रदेशीं| विश्व देख विस्तारेंशी| आणि विश्वाही परौतें मानसीं| जरी देखावें वर्ते ||१५०||
तरी इयेही विषयींचें कांहीं| एथ सर्वथा सांकडें नाहीं| सुखें आवडे तें माझिया देहीं| देखसी तूं ||१५१||
ऐसें विश्वमूर्ती तेणें| बोलिलें कारुण्यपूर्णें| तंव देखत आहे कीं नाहीं न म्हणे| निवांतुचि येरु ||१५२||
एथ कां पां हा उगला ? | म्हणौनि श्रीकृष्णें जंव पाहिला| तंव आर्तीचें लेणें लेइला| तैसाचि आहे ||१५३||
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा |
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ||८||
मग म्हणें उत्कंठे वोहट न पडे| अझुनी सुखाची सोय न सांपडे| परी दाविलें तें फुडें| नाकळेचि यया ||१५४||
हे बोलोनि देवो हांसिले| हांसोनि देखणियातें म्हणितलें| आम्हीं विश्वरूप तरी दाविलें| परी न देखसीच तूं ||१५५||
यया बोला येरें विचक्षणें| म्हणितलें हां जी कवणासी तें उणें ? | तुम्ही बकाकरवीं चांदिणें| चरऊं पहा मा ||१५६||
हां हो उटोनियां आरिसा| आंधळिया द्ॐ बैसा| बहिरियापुढें हृषीकेशा| गाणीव करा ||१५७||
मकरंदकणाचा चारा| जाणतां घालूनि दर्दुरा| वायां धाडा शारङ्गधरा| कोपा कवणा ||१५८||
जें अतींद्रिय म्हणौनि व्यवस्थिलें| केवळ ज्ञानदृष्टीचिया भागा फिटलें| तें तुम्हीं चर्मचक्षूंपुढें सूदलें| मी कैसेनि देखें ||१५९||
परी हें तुमचें उणें न बोलावें| मीचि साहें तेंचि बरवें| एथ आथि म्हणितलें देवें| मानूं बापा ||१६०||
साच विश्वरूप जरी आम्ही दावावें| तरी आधीं देखावया सामर्थ्य कीं द्यावें| परी बोलत बोलत प्रेमभावें |
धसाळ गेलों ||१६१||
काय जाहलें न वाहतां भुई पेरिजे| तरी तो वेलु विलया जाइजे| तरी आतां माझें निजरूप देखिजे |
तें दृष्टी देवों तुज ||१६२||
मग तिया दृष्टी पांडवा| आमुचा ऐश्वर्ययोगु आघवा| देखोनियां अनुभवा| माजिवडा करीं ||१६३||
ऐसें तेणें वेदांतवेद्यें| सकळ लोक आद्यें| बोलिलें आराध्यें| जगाचेनि ||१६४||
संजय उवाच |
एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः |
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ||९||
पैं कौरवकुलचक्रवर्ती| मज हाचि विस्मयो पुढतपुढती| जे श्रियेहूनि त्रिजगतीं| सदैव असे कवणी ? ||१६५||
ना तरी खुणेचें वानावयालागीं| श्रुतीवांचूनि दावा पां जगीं| ना सेवकपण तरी आंगीं| शेषाच्याचि आथी ||१६६||
हां हो जयाचेनि सोसें| शिणत आठही पहार योगी जैसे| अनुसरलें गरुडाऐसें| कवण आहे ? ||१६७||
परी तें आघवेंचि एकीकडे ठेलें| सापें कृष्णसुख एकंदरें जाहलें| जिये दिवूनि जन्मले| पांडव हे ||१६८||
परी पांचांही आंतु अर्जुना| श्रीकृष्ण सावियाचि जाहला अधीना| कामुक कां जैसा अंगना| आपैता कीजे ||१६९||
पढविलें पाखरूं ऐसें न बोले| यापरी क्रीडामृगही तैसा न चले| कैसें दैव एथें सुरवाडलें| तें जाणों न ये ||१७०||
आजि हें परब्रह्म सगळें| भोगावया सदैव याचेचि डोळे| कैसे वाचेनि हन लळे| पाळीत असे ||१७१||
हा कोपे कीं निवांतु साहे| हा रुसे तरी बुझावीत जाये| नवल पिसें लागलें आहे| पार्थाचें देवा ||१७२||
एऱ्हवीं विषय जिणोनि जन्मले| जे शुकादिक दादुले| ते विषयोचि वानितां जाहले| भाट ययाचें ||१७३||
हा योगियांचें समाधिधन| कीं होऊनि ठेले पार्थाआधीन| यालागीं विस्मयो माझें मन| करीतसे राया ||१७४||
तेवींचि संजय म्हणे कायसा| विस्मयो एथें कौरवेशा| श्रीकृष्णें स्वीकारिजे तया ऐसा| भाग्योदय होय ||१७५||
म्हणौनि तो देवांचा रावो| म्हणे पार्थाते तुज दृष्टि देवों| जया विश्वरूपाचा ठावो| देखसी तूं ||१७६||
ऐसी श्रीमुखौनि अक्षरें| निघती ना जंव एकसरें| तंव अविद्येचे आंधारें| जावोंचि लागे ||१७७||
तीं अक्षरें नव्हती देखा| ब्रह्मसाम्राज्यदीपिका| अर्जुनालागीं चित्कळिका| उजळलिया श्रीकृष्णें ||१७८||
मग दिव्यचक्षुप्रकाशु प्रगटला| तया ज्ञानदृष्टी फांटा फुटला| ययापरी दाविता जाहला| ऐश्वर्य आपुलें ||१७९||
हे अवतार जे सकळ| ते जिये समुद्रींचे कां कल्लोळ| विश्व हें मृगजळ| जया रश्मीस्तव दिसे ||१८०||
जिये अनादिभूमिके निटे| चराचर हें चित्र उमटे| आपणपें श्रीवैकुंठें| दाविलें तया ||१८१||
मागां बाळपणीं येणें श्रीपती| जैं एक वेळ खादली होती माती| तैं कोपोनियां हातीं| यशोदां धरिला ||१८२||
मग भेणें भेणें जैसें| मुखीं झाडा द्यावयाचेनि मिसें| चवदाही भुवनें सावकाशें| दाविलीं तिये ||१८३||
ना तरी मधुवनीं ध्रुवासि केलें| जैसें कपोल शंखें शिवतलें| आणि वेदांचियेही मतीं ठेलें| तें लागला बोलों ||१८४||
तैसा अनुग्रहो पैं राया| श्रीहरी केला धनंजया| आतां कवणेकडेही माया| ऐसी भाष नेणेंचि तो ||१८५||
एकसरें ऐश्वर्यतेजें पाहलें| तया चमत्काराचें एकार्णव जाहलें| चित्त समाजीं बुडोनि ठेलें| विस्मयाचिया ||१८६||
जैसा आब्रह्म पूर्णोदकीं| पव्हे मार्कंडेय एकाकीं| तैसा विश्वरूप कौतुकीं| पार्थु लोळे ||१८७||
म्हणे केवढें गगन एथ होतें| तें कवणें नेलें पां केउतें| तीं चराचर महाभूतें| काय जाहलीं ? ||१८८||
दिशांचे ठावही हारपले| आधोर्ध्व काय नेणों जाहले| चेइलिया स्वप्न तैसे गेले| लोकाकार ||१८९||
नाना सूर्यतेजप्रतापें| सचंद्र तारांगण जैसें लोपे| तैसीं गिळिलीं विश्वरूपें| प्रपंचरचना ||१९०||
तेव्हां मनासी मनपण न स्फुरे| बुद्धि आपणपें न सांवरें| इंद्रियांचे रश्मी माघारे| हृदयवरी भरले ||१९१||
तेथ ताटस्थ्या ताटस्थ्य पडिलें| टकासी टक लागले| जैसें मोहनास्त्र घातलें| विचारजातां ||१९२||
तैसा विस्मितु पाहे कोडें| तंव पुढां होतें चतुर्भुज रूपडें| तेंचि नानारूप चहूंकडे| मांडोनि ठेलें ||१९३||
जैसें वर्षाकाळींचे मेघौडे| कां महाप्रळयींचें तेज वाढे| तैसें आपणावीण कवणीकडे| नेदीचि उरों ||१९४||
प्रथम स्वरूपसमाधान| पावोनि ठेला अर्जुन| सवेचि उघडी लोचन| तंव विश्वरूप देखें ||१९५||
इहींचि दोहीं डोळां| पाहावें विश्वरूपा सकळा| तो श्रीकृष्णें सोहळा| पुरविला ऐसा ||१९६||
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् |
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ||१०||
मग तेथ सैंघ देखे वदनें| जैसी रमानायकाचीं राजभुवनें| नाना प्रगटलीं निधानें| लावण्यश्रियेचीं ||१९७||
कीं आनंदाची वनें सासिन्नलीं| जैसी सौंदर्या राणीव जोडली| तैसीं मनोहरें देखिलीं| हरीचीं वक्त्रें ||१९८||
तयांही माजीं एकैकें| सावियाचि भयानकें| काळरात्रीचीं कटकें| उठवलीं जैसीं ||१९९||
कीं मृत्यूसीचि मुखें जाहलीं| हो कां जें भयाचीं दुर्गें पन्नासिलीं| कीं महाकुंडें उघडलीं| प्रळयानळाचीं ||२००||
तैसीं अद्भुतें भयासुरें| तेथ वदनें देखिलीं वीरें| आणिकें असाधारणें साळंकारें| सौम्यें बहुतें ||२०१||
पैं ज्ञानदृष्टीचेनि अवलोकें| परी वदनांचा शेवटु न टके| मग लोचन तें कवतिकें| लागला पाहों ||२०२||
तंव नानावर्णें कमळवनें| विकासिलीं तैसे अर्जुनें| डोळे देखिले पालिंगनें| आदित्यांचीं ||२०३||
तेथेंचि कृष्णमेघांचिया दाटी- | माजीं कल्पांत विजूंचिया स्फुटी| तैसिया वन्हि पिंगळा दिठी| भ्रूभंगातळीं ||२०४||
हें एकैक आश्चर्य पाहतां| तिये एकेचि रूपीं पंडुसुता| दर्शनाची अनेकता| प्रतिफळली ||२०५||
मग म्हणे चरण ते कवणेकडे| केउते मुकुट कें दोर्दंडें| ऐसी वाढविताहे कोडें| चाड देखावयाची ||२०६||
तेथ भाग्यनिधि पार्था| कां विफलत्व होईल मनोरथा| काय पिनाकपाणीचिया भातां| वायकांडीं आहाती ? ||२०७||
ना तरी चतुराननाचिये वाचे| काय आहाती लटिकिया अक्षरांचे साचे ? | म्हणौनि साद्यंतपण अपारांचे| देखिलें तेणें ||२०८||
जयाची सोय वेदां नाकळे| तयाचे सकळावयव एकेचि वेळे| अर्जुनाचे दोन्ही डोळे| भोगिते जाहले ||२०९||
चरणौनि मुकुटवरी| देखत विश्वरूपाची थोरी| जे नाना रत्न अळंकारीं| मिरवत असे ||२१०||
परब्रह्म आपुलेनि आंगें| ल्यावया आपणचि जाहला अनेगें| तियें लेणीं मी सांगें| काइसयासारिखीं ||२११||
जिये प्रभेचिये झळाळा| उजाळु चंद्रादित्यमंडळा| जे महातेजाचा जिव्हाळा| जेणें विश्व प्रगटे ||२१२||
तो दिव्यतेज शृंगारु| कोणाचिये मतीसी होय गोचरु| देव आपणपेंचि लेइले ऐसें वीरु| देखत असे ||२१३||
मग तेथेंचि ज्ञानाचिया डोळां| पहात करपल्लवां जंव सरळा| तंव तोडित कल्पांतींचिया ज्वाळा |
तैसीं शस्त्रें झळकत देखे ||२१४||
आपण आंग आपण अलंकार| आपण हात आपण हतियार| आपण जीव आपण शरीर| देखें चराचर कोंदलें देवें ||२१५||
जयाचिया किरणांचे निखरपणें| नक्षत्रांचे होत फुटाणे| तेजें खिरडला वन्हि म्हणे| समुद्रीं रिघों ||२१६||
मग कालकूटकल्लोळीं कवळिलें| नाना महाविजूंचें दांग उमटलें| तैसे अपार कर देखिले| उदितायुधीं ||२१७||
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् |
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ||११||
कीं भेणें तेथूनि काढिली दिठी| मग कंठमुगुट पहातसे किरीटी| तंव सुरतरूची सृष्टी| जयांपासोनि कां जाहली ||२१८||
जिये महासिद्धींचीं मूळपीठें| शिणली कमळा जेथ वावटे| तैसीं कुसुमें अति चोखटें| तुरंबिलीं देखिलीं ||२१९||
मुगुटावरी स्तबक| ठायीं ठायीं पूजाबंध अनेक| कंठीं रुळताति अलौकिक| माळादंड ||२२०||
स्वर्गें सूर्यतेज वेढिलें| जैसें पंधरेनें मेरूतें मढिलें| तैसें नितंबावरी गाढिलें| पीतांबरु झळके ||२२१||
श्रीमहादेवो कापुरें उटिला| कां कैलासु पारजें डवरिला| नाना क्षीरोदकें पांघरविला| क्षीरार्णवो जैसा ||२२२||
जैसी चंद्रमयाची घडी उपलविली| मग गगनाकरवीं बुंथी घेवविली| तैसीं चंदनपिंजरी देखिली| सर्वांगीं तेणें ||२२३||
जेणें स्वप्रकाशा कांतीं चढे| ब्रह्मानंदाचा निदाघु मोडे| जयाचेनि सौरभ्यें जीवित जोडे| वेदवतीये ||२२४||
जयाचे निर्लेप अनुलेपु करी| जे अनंगुही सर्वांगीं धरी| तया सुगंधाची थोरी| कवण वानी ? ||२२५||
ऐसी एकैक शृंगारशोभा| पाहतां अर्जुन जातसें क्षोभा| तेवींचि देवो बैसला कीं उभा| का शयालु हें नेणवें ||२२६||
बाहेर दिठी उघडोनि पाहे| तंव आघवें मूर्तिमय देखत आहे| मग आतां न पाहें म्हणौनि उगा राहे |
तरी आंतुही तैसेंचि ||२२७||
अनावरें मुखें समोर देखे| तयाभेणें पाठीमोरा जंव ठाके| तंव तयाहीकडे श्रीमुखें| करचरण तैसेचि ||२२८||
अहो पाहतां कीर प्रतिभासे| एथ नवलावो काय असे ? | परि न पाहतांही दिसे| चोज आइका ||२२९||
कैसें अनुग्रहाचें करणें| पार्थाचें पाहणें आणि न पाहणें| तयाही सकट नारायणें| व्यापूनि घेतलें ||२३०||
म्हणौनि आश्चर्याच्या पुरीं एकीं| पडिला ठायेठाव थडीं ठाकी| तंव चमत्काराचिया आणिकीं| महार्णवीं पडे ||२३१||
तैसा अर्जुनु असाधारणें| आपुलिया दर्शनाचेनि विंदाणें| कवळूनि घेतला तेणें| अनंतरूपें ||२३२||
तो विश्वतोमुख स्वभावें| आणि तेचि दावावयालागीं पांडवें| प्रार्थिला आतां आघवें| होऊनि ठेला ||२३३||
आणि दीपें कां सूर्यें प्रगटे| अथवा निमुटलिया देखावेंचि खुंटे| तैसी दिठी नव्हे जे वैकुंठें| दिधली आहे ||२३४||
म्हणौनि किरीटीसि दोहीं परी| तें देखणें देखें अंधारी| हें संजयो हस्तिनापुरीं| सांगतसे राया ||२३५||
म्हणे किंबहुना अवधारिलें| पार्थें विश्वरूप देखिलें| नाना आभरणीं भरलें| विश्वतोमुख ||२३६||
दिवि सूर्य सहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता |
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ||१२||
तिये अंगप्रभेचा देवा| नवलावो काइसया ऐसा सांगावा| कल्पांतीं एकुचि मेळावा| द्वादशादित्यांचा होय ||२३७||
तैसे ते दिव्यसूर्य सहस्रवरी| जरी उदयजती कां एकेचि अवसरीं| तऱ्ही तया तेजाची थोरी| उपमूं नये ||२३८||
आघवयाचि विजूंचा मेळावा कीजे| आणि प्रळयाग्नीची सर्व सामग्री आणिजे| तेवींचि दशकुही मेळविजे |
महातेजांचा ||२३९||
तऱ्ही तिये अंगप्रभेचेनि पाडें| हें तेज कांहीं कांहीं होईल थोडें| आणि तया ऐसें कीर चोखडें| त्रिशुद्धी नोहे ||२४०||
ऐसें महात्म्य या श्रीहरीचें सहज| फांकतसे सर्वांगीचें तेज| तें मुनिकृपा जी मज| दृष्ट जाहलें ||२४१||
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नम् प्रविभक्तमनेकधा |
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पांडवस्तदा ||१३||
आणि तिये विश्वरूपीं एकीकडे| जग आघवें आपुलेनि पवाडें| जैसे महोदधीमाजीं बुडबुडे| सिनानें दिसती ||२४२||
कां आकाशीं गंधर्वनगर| भूतळीं पिपीलिका बांधे घर| नाना मेरुवरी सपूर| परमाणु बैसले ||२४३||
विश्व आघवेंचि तयापरी| तया देवचक्रवर्तीचिया शरीरीं| अर्जुन तिये अवसरीं| देखता जाहला ||२४४||
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः |
प्रणम्य शिरसा देवं कृताज़्जलिरभाषत ||१४||
तेथ एक विश्व एक आपण| ऐसें अळुमाळ होतें जें दुजेपण| तेंही आटोनि गेलें अंतःकरण| विरालें सहसा ||२४५||
आंतु आनंदा चेइरें जाहलें| बाहेरि गात्रांचें बळ हारपोनि गेलें| आपाद पां गुंतलें| पुलकांचलें ||२४६||
वार्षिये प्रथमदशे| वोहळलया शैलांचें सर्वांग जैसें| विरूढे कोमलांकुरीं तैसे| रोमांच जाहले ||२४७||
शिवतला चंद्रकरीं| सोमकांतु द्रावो धरी| तैसिया स्वेदकणिका शरीरीं| दाटलिया ||२४८||
माजीं सापडलेनि अलिकुळें| जळावरी कमळकळिका जेवीं आंदोळे| तेवीं आंतुलिया सुखोर्मीचेनि बळें| बाहेरि कांपे ||२४९||
कर्पूरकर्दळीचीं गर्भपुटें| उकलतां कापुराचेनि कोंदाटें| पुलिका गळती तेवीं थेंबुटें| नेत्रौनि पडती ||२५०||
उदयलेनि सुधाकरें| जैसा भरलाचि समुद्र भरे| तैसा वेळोवेळां उर्मिभरें| उचंबळत असे ||२५१||
ऐसा सात्त्विकांही आठां भावां| परस्परें वर्ततसे हेवा| तेथ ब्रह्मानंदाची जीवा| राणीव फावली ||२५२||
तैसाचि तया सुखानुभवापाठीं| केला द्वैताचा सांभाळु दिठी| मग उसासौनि किरीटी| वास पाहिली ||२५३||
तेथ बैसला होता जिया सवा| तियाचिया कडे मस्तक खालविला देवा| जोडूनि करसंपुट बरवा| बोलतु असे ||२५४||
अर्जुन उवाच |
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् |
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ मृषींश्चसर्वानुरगांश्च दिव्यान् ||१५||
म्हणे जयजयाजी स्वामी| नवल कृपा केली तुम्हीं| जें हें विश्वरूप कीं आम्हीं| प्राकृत देखों ||२५५||
परि साचचि भलें केलें गोसाविया| मज परितोषु जाहला साविया| जी देखलासि जो इया| सृष्टीसी तूं आश्रयो ||२५६||
देवा मंदराचेनि अंगलगें| ठायीं ठायीं श्वापदांचीं दांगें| तैसीं इयें तुझ्या देहीं अनेगें| देखतसें भुवनें ||२५७||
अहो आकाशचिये खोळे| दिसती ग्रहगणांचीं कुळें| कां महावृक्षीं अविसाळें| पक्षिजातीचीं ||२५८||
तयापरी श्रीहरी| तुझिया विश्वात्मकीं इये शरीरीं| स्वर्गु देखतसें अवधारीं| सुरगणेंसीं ||२५९||
प्रभु महाभूतांचें पंचक| येथ देखत आहे अनेक| आणि भूतग्राम एकेक| भूतसृष्टीचें ||२६०||
जी सत्यलोकु तुजमाजीं आहे| देखिला चतुराननु हा नोहे ? | आणि येरीकडे जंव पाहें| तंव कैलासुही दिसे ||२६१||
श्रीमहादेव भवानियेशीं| तुझ्या दिसतसे एके अंशीं| आणि तूंतेंही गा हृषीकेशी| तुजमाजीं देखे ||२६२||
पैं कश्यपादि ऋषिकुळें| इयें तुझिया स्वरूपीं सकळें| देखतसें पाताळें| पन्नगेंशीं ||२६३||
किंबहुना त्रैलोक्यपती| तुझिया एकेकाचि अवयवाचिये भिंती| इयें चतुर्दशभुवनें चित्राकृती| अंकुरलीं जाणों ||२६४||
आणि तेथिंचे जे जे लोक| ते चित्ररचना जी अनेक| ऐसें देखतसे अलोकिक| गांभीर्य तुझें ||२६५||
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनंतरूपम् |
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूपम् ||१६||
त्या दिव्यचक्षूंचेनि पैसें| चहुंकडे जंव पाहात असें| तंव दोर्दंडीं कां जैसें| आकाश कोंभैलें ||२६६||
तैसे एकचि निरंतर| देवा देखत असें तुझे कर| करीत आघवेचि व्यापार| एकेचि काळीं ||२६७||
मग महाशून्याचेनि पैसारें| उघडलीं ब्रह्मकटाहाचीं भांडारें| तैसीं देखतसें अपारें| उदरें तुझीं ||२६८||
जी सहस्रशीर्षयाचें देखिलें| कोडीवरी होताति एकीवेळें| कीं परब्रह्मचि वदनफळें| मोडोनि आलें ||२६९||
तैसीं वक्त्रें जी जेउतीं तेउतीं| तुझीं देखितसे विश्वमूर्ती| आणि तयाचिपरी नेत्रपंक्ती| अनेका सैंघ ||२७०||
हें असो स्वर्ग पाताळ| कीं भूमी दिशा अंतराळ| हे विवक्षा ठेली सकळ| मूर्तिमय देखतसें ||२७१||
हें तुजवीण एकादियाकडे| परमाणूहि एतुला कोडें| अवकाशु पाहतसें परि न सांपडे| ऐसें व्यापिलें तुवां ||२७२||
इये नानापरी अपरिमितें| जेतुलीं साठविलीं होतीं महाभूतें| तेतुलाहि पवाडु तुवां अनंतें| कोंदला देखतसें ||२७३||
ऐसा कवणें ठायाहूनि तूं आलासी| एथ बैसलासि कीं उभा आहासि| आणि कवणिये मायेचिये पोटीं होतासी |
तुझें ठाण केवढें ||२७४||
तुझें रूप वय कैसें| तुजपैलीकडे काय असे| तूं काइसयावरी आहासि ऐसें| पाहिलें मियां ||२७५||
तंव देखिलें जी आघवेंचि| तरि आतां तुज ठावो तूंचि| तूं कवणाचा नव्हेसि ऐसाचि| अनादि आयता ||२७६||
तूं उभा ना बैठा| दिघडु ना खुजटा| तुज तळीं वरी वैकुंठा| तूंचि आहासी ||२७७||
तूं रूपें आपणयांचि ऐसा| देवा तुझी तूंचि वयसा| पाठीं पोट परेशा| तुझें तूं गा ||२७८||
किंबहुना आतां| तुझें तूंचि आघवें अनंता| हें पुढत पुढती पाहतां| देखिलें मियां ||२७९||
परि या तुझिया रूपाआंतु| जी उणीव एक असे देखतु| जे आदि मध्य अंतु| तिन्हीं नाहीं ||२८०||
एऱ्हवीं गिंवसिलें आघवां ठायीं| परि सोय न लाहेचि कहीं| म्हणौनि त्रिशुद्धी हे नाहीं| तिन्ही एथ ||२८१||
एवं आदिमध्यांतरहिता| तूं विश्वेश्वरा अपरिमिता| देखिलासि जी तत्त्वतां| विश्वरूपा ||२८२||
तुज महामूर्तीचिया आंगी| उमटलिया पृथक् मूर्ती अनेगी| लेइलासी वानेपरींची आंगीं| ऐसा आवडतु आहासी ||२८३||
नाना पृथक् मूर्ती तिया द्रुमवल्ली| तुझिया स्वरूपमहाचळीं| दिव्यालंकार फुलीं फळीं| सासिन्नलिया ||२८४||
हो कां जे महोदधीं तूं देवा| जाहलासि तरंगमूर्ती हेलावा| कीं तूं एक वृक्षु बरवा| मूर्तिफळीं फळलासी ||२८५||
जी भूतीं भूतळ मांडिलें| जैसें नक्षत्रीं गगन गुढलें| तैसें मूर्तिमय भरलें| देखतसें तुझें रूप ||२८६||
जी एकेकीच्या अंगप्रांतीं| होय जाय हें त्रिजगती| एवढियाही तुझ्या आंगीं मूर्ती| कीं रोमा जालिया ||२८७||
ऐसा पवाडु मांडूनि विश्वाचा| तूं कवण पां एथ कोणाचा| हें पाहिलें तंव आमुचा| सारथी तोचि तूं ||२८८||
तरी मज पाहतां मुकुंदा| तूं ऐसाचि व्यापकु सर्वदा| मग भक्तानुग्रहें तया मुग्धा| रूपातें धरिसी ||२८९||
कैसें चहूं भुजांचें सांवळें| पाहतां वोल्हावती मन डोळे| खेंव देऊं जाइजे तरी आकळे| दोहींचि बाहीं ||२९०||
ऐसी मूर्ति कोडिसवाणी कृपा| करूनि होसी ना विश्वरूपा| कीं अमुचियाचि दिठी सलेपा| जें सामान्यत्वें देखिती ||२९१||
तरी आतां दिठीचा विटाळु गेला| तुवां सहजें दिव्यचक्षू केला| म्हणौनि यथारूपें देखवला| महिमा तुझा ||२९२||
परी मकरतुंडामागिलेकडे| तोचि होतासि तूं एवढें| रूप जाहलासि हें फुडें| वोळखिलें मियां ||२९३||
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् |
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ||१७||
नोहे तोचि हा शिरीं ? | मुकुट लेइलासि श्रीहरी| परी आतांचें तेज आणि थोरी| नवल कीं बहु हें ||२९४||
तेंचि हें वरिलियेचि हातीं| चक्र परिजितया आयती| सांवरितासि विश्वमूर्ती| ते न मोडे खूण ||२९५||
येरीकडे तेचि हे नोहे गदा| आणि तळिलिया दोनी भुजा निरायुधा| वागोरे सांवरावया गोविंदा| संसरिलिया ||२९६||
आणि तेणेंचि वेगें सहसा| माझिया मनोरथासरिसा| जाहलासि विश्वरूपा विश्वेशा| म्हणौनि जाणें ||२९७||
परी कायसें बा हें चोज| विस्मयो करावयाहि पाडू नाहीं मज| चित्त होऊनि जातसें निर्बुज| आश्चर्यें येणें ||२९८||
हें एथ आथि कां येथ नाहीं| ऐसें श्वसोंही नये कांहीं| नवल अंगप्रभेची नवाई| कैसी कोंदलीं सैंघ ||२९९||
एथ अग्नीचीही दिठी करपत| सूर्य खद्योतु तैसा हारपत| ऐसें तीव्रपण अद्भुत| तेजाचें यया ||३००||
हो कां महातेजाचिया महार्णवीं| बुडोनि गेली सृष्टी आघवी| कीं युगांतविजूंच्या पालवीं| झांकलें गगन ||३०१||
नातरी संहारतेजाचिया ज्वाळा| तोडोनि माचू बांधला अंतराळां| आतां दिव्य ज्ञानाचिया डोळां| पाहवेना ||३०२||
उजाळु अधिकाधिक बहुवसु| धडाडीत आहे अतिदाहसु| पडत दिव्यचक्षुंसही त्रासु| न्याहाळितां ||३०३||
हो कां जे महाप्रळयींचा भडाडु| होता काळाग्निरुद्राचिया ठायीं गूढु| तो तृतीयनयनाचा मढू| फुटला जैसा ||३०४||
तैसें पसरलेनि प्रकाशें| सैंघ पांचवनिया ज्वाळांचे वळसे| पडतां ब्रह्मकटाह कोळिसे| होत आहाती ||३०५||
ऐसा अद्भुत तेजोराशी| जन्मा नवल म्यां देखिलासी| नाहीं व्याप्ती आणि कांतीसी| पारु जी तुझिये ||३०६||
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ||१८||
देवा तूं अक्षर| औटाविये मात्रेसि पर| श्रुती जयाचें घर| गिंवसीत आहाती ||३०७||
जें आकाराचें आयतन| जें विश्वनिक्षेपैकनिधान| तें अव्यय तूं गहन| अविनाश जी ||३०८||
तूं धर्माचा वोलावा| अनादिसिद्ध तूं नित्य नवा| जाणें मी सदतिसावा| पुरुष विशेष तूं ||३०९||
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यं अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् |
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ||१९||
तूं आदिमध्यांतरहितु| स्वसामर्थ्यें तूं अनंतु| विश्वबाहु अपरिमितु| विश्वचरण तूं ||३१०||
पैं चंद्र चंडांशु डोळां| दावितासि कोपप्रसाद लीळा| एकां रुससी तमाचिया डोळां| एकां पाळितोसि कृपादृष्टी ||३११||
जी एवंविधा तूंतें| मी देखतसें हें निरुतें| पेटलें प्रळयाग्नीचें उजितें| तैसें वक्त्र हें तुझें ||३१२||
वणिवेनि पेटले पर्वत| कवळूनि ज्वाळांचे उभड उठत| तैसी चाटीत दाढा दांत| जीभ लोळे ||३१३||
इये वदनींचिया उबा| आणि जी सर्वांगकांतीचिया प्रभा| विश्व तातलें अति क्षोभा| जात आहे ||३१४||
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः |
दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ||२०||
कां जे द्यौर्लोक आणि पाताळ| पृथिवी आणि अंतराळ| अथवा दशदिशा समाकुळ| दिशाचक्र ||३१५||
हें आघवेंचि तुंवा एकें| भरलें देखत आहे कौतुकें| परि गगनाहीसकट भयानकें| आप्लविजे जेवीं ||३१६||
नातरी अद्भुतरसाचिया कल्लोळीं| जाहली चवदाही भुवनांसि कडियाळीं| तैसें आश्चर्यचि मग मी आकळीं |
काय एक ? ||३१७||
नावरे व्याप्ती हे असाधारण| न साहवे रूपाचें उग्रपण| सुख दूरी गेलें परि प्राण| विपायें धरीजे ||३१८||
देवा ऐसें देखोनि तूंतें| नेणों कैसें आलें भयाचें भरितें| आतां दुःखकल्लोळीं झळंबतें| तिन्हीं भुवनें ||३१९||
एऱ्हवीं तुज महात्मयाचें देखणें| तरि भयदुःखासि कां मेळवणें ? | परि हें सुख नव्हेचि जेणें गुणें| तें जाणवत आहे मज ||३२०||
जंव तुझें रूप नोहे दिठें| तंव जगासि संसारिक गोमटें| आतां देखिलासि तरी विषयविटें| उपनला त्रासु ||३२१||
तेवींचि तुज देखिलियासाठीं| काय सहसा तुज देवों येईल मिठी| आणि नेदीं तरी शोकसंकटीं| राहों केवीं ? ||३२२||
म्हणौनि मागां सरों तंव संसारु| आडवीत येतसे अनिवारु| आणि पुढां तूं तंव अनावरु| न येसि घेवों ||३२३||
ऐसा माझारलिया सांकडां| बापुड्या त्रैलोक्याचा होतसे हुरडा| हा ध्वनि जी फुडा| चोजवला मज ||३२४||
जैसा आरंबळला आगीं| तो समुद्रा ये निवावयालागीं| तंव कल्लोळपाणियाचिया तरंगीं| आगळा बिहे ||३२५||
तैसें या जगासि जाहलें| तूंतें देखोनि तळमळित ठेलें| यामाजीं पैल भले| ज्ञानशूरांचे मेळावे ||३२६||
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति |
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां सुतिभिः पुष्कलाभिः ||२१||
हे तुझेनि आंगिकें तेजें| जाळूनि सर्व कर्मांचीं बीजें| मिळत तुज आंतु सहजें| सद्भावेसीं ||३२७||
आणिक एक सावियाचि भयभीरु| सर्वस्वें धरूनि तुझी मोहरु| तुज प्रार्थिताति करु| जोडोनियां ||३२८||
देवा अविद्यार्णवीं पडिलों| जी विषयवागुरें आंतुडलों| स्वर्गसंसाराचिया सांकडलों| दोहीं भागीं ||३२९||
ऐसें आमुचें सोडवणें| तुजवांचोनि कीजेल कवणें ? | तुज शरण गा सर्वप्राणें| म्हणत देवा ||३३०||
आणि महर्षी अथवा सिद्ध| कां विद्याधरसमूह विविध| हे बोलत तुज स्वस्तिवाद| करिती स्तवन ||३३१||
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोश्मपाश्च |
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ||२२||
हे रुद्रादित्यांचे मेळावे| वसु हन साध्य आघवे| अश्विनौ देव विश्वेदेव विभवें| वायुही हे जी ||३३२||
अवधारा पितर हन गंधर्व| पैल यक्षरक्षोगण सर्व| जी महेंद्रमुख्य देव| कां सिद्धादिक ||३३३||
हे आघवेचि आपुलालिया लोकीं| सोत्कंठित अवलोकीं| हे महामूर्ती दैविकी| पाहात आहाती ||३३४||
मग पाहात पाहात प्रतिक्षणीं| विस्मित होऊनि अंतःकरणीं| क


